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गुरुवार, 28 मई 2020

चीन से तनातनी का हल संयम और चतुराई से ही संभव, हड़बड़ाहट में अमेरिका की गोद में बैठने से होगा



                 
सलमान खुर्शीद

सलमान खुर्शीद

चीन के साथ हमारे रिश्ते अजीब हैं। 1975 के बाद किसी भी पक्ष की ओर से एक भी गोली नहीं दागी गई, फिर भी सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच कभी-कभार तनाव की कुछ घटनाएं हो जाती हैं। कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं कि जिनका काल चंद घंटों का होता है तो कुछ ऐसी होती हैं जो धीरे-धीरे आकार लेती हैं और गतिरोध कई दिनों तक बना रहता है। दोनों पक्ष इस दौरान अनिवार्य रूप से संयम का परिचय देते हैं और इसी का नतीजा होता है कि जब फिर से शांति और सामान्य स्थिति बहाल होती है तो किसी भी पक्ष में खोने-पाने जैसा कोई भाव नहीं रहता।
जब मैं विदेश मंत्री के रूप में चीन गया था तो मेरी मुलाकात प्रधानमंत्री ली केकियांग से हुई। यह बैठक इतनी दोस्ताना थी कि मैंने उनसे पूछ लिया कि हाल ही में भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनाव की स्थिति बन गई थी और मेरे बीजिंग के लिए रवाना होने से कुछ ही दिन पहले यह मामला निपट सका था, आखिर इस तरह की घटनाएं होती ही क्यों हैं? इस पर केकियांग मुस्कुराए और सवालिया भाव के साथ अपने सहयोगी अधिकारियों की ओर देखा। फिर उनमें कुछ बात हुई और उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि वे इसके कारणों का पता लगाएंगे।
प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन की ऐतिहासिक यात्रा से दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघली और उसके बाद से ही दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को लेकर परस्पर अवधारणाओं के मतभेद को दूर करने की लगातार और पूरी-पूरी कोशिश कर रहे हैं। दोनों देशों ने आपस में तमाम नक्शों और विचारों का आदान-प्रदान किया है, ताकि आम सहमति पर पहुंचने की संभावनाओं की तलाश की जा सके।
हम सभी जानते हैं कि विवाद का कारण रणनीतिक लाभ-हानि के बारे में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी धारणाएं हैं। किसी असंबद्ध आम व्यक्ति को ऐसा लग सकता है कि यह एक ऐसा निरर्थक खेल है जिसमें बहुत कुछ काल्पनिक है और बाकी वैयक्तिक और सामूहिक अहं से प्रेरित। लेकिन सैन्य और राजनयिक दृष्टि रखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि इससे जुड़े तमाम बारीक और रणनीतिक पहलू हैं, जिनका समाधान जरूरी है। यह एक धीमी प्रक्रिया है और इस पर इस बात का कोई खास अंतर नहीं पड़ता कि आसपास और क्या हो रहा है।
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पिछले सप्ताह, खास तौर पर 5 मई और फिर 9 मई के बाद से भारत और चीन की सेनाएं पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास के परंपरागत विवादित इलाकों के अलावा कई वैसे क्षेत्रों में भी जहां पहले कभी कोई विवाद नहीं रहा, बिल्कुल आमने- सामने की स्थिति में हैं। इसे देखते हुए ऐसा लग रहा है कि ताजा तनातनी 2017 में 73 दिन तक डोकलाम में चले संघर्ष के बाद सबसे बड़ा सैन्य गतिरोध साबित होने जा रही है। ऐसी जानकारी मिल रही है कि भारत ने पैंगोंग त्सो और गलवान घाटी में अपनी मोर्चेबंदी मजबूत की है, क्योंकि इन दोनों विवादित इलाकों में चीन ने अस्थायी निर्माण के साथ ही दो से ढाई हजार सैनिकों की तैनाती कर दी है।
पैंगोंग त्सो में वास्तविक नियंत्रण रेखा कहां से गुजरती है, इसे लेकर दोनों पक्षों की अवधारणाएं अलग-अलग हैं, जिसके कारण इस इलाके में कथित सीमा-उल्लंघन के मामले काफी अधिक होते हैं। लेकिन गलवान नदी के जिन इलाकों में अभी दोनों सेनाओं के बीच तनाव हो गया है, वहां हाल के वर्षों में चीन की ओर से अतिक्रमण की केवल छह घटनाएं हुईं- 2017 में चार और 2018 और 2016 में एक-एक घटना।
1962 के युद्ध के दौरान गहमागहमी वाला इलाका रहा गलवान नदी क्षेत्र एलएसी का ऐसा क्षेत्र है, जहां इस रेखा को लेकर दोनों पक्षों में सहमति बन चुकी थी और इस नजरिये से यहां एलएसी पर पैदा हुआ तनाव एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। सवाल यह उठता है कि ‘आखिर ऐसा क्यों हुआ, और अभी ही क्यों हुआ?’ और क्या हमें पहले की तरह चुपचाप बैठकर इंतजार करना चाहिए कि अंततः तनाव खत्म हो जाएगा और स्थितियां सामान्य हो जाएंगी?
तथ्य तो यही है कि हमारी जो भी परिकल्पना हो, हमें जवाब तो देना पड़ेगा। सवाल यह नहीं है कि कौन पहले नजरें झुकाता है। चीनी सेना पीएलए द्वारा जबरन कब्जा की गई एक-एक इंच जमीन तोलमोल की हमारी ताकत को घटाती है और इसके कारण दुनिया में हमारी प्रतिष्ठा पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक असर की तो बात ही अलग है।
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कोविड-19 की वैश्विक महामारी और नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप के रुख को लेकर अनिश्चितताएं और भी अधिक हो गई हैं और इन स्थितियों में चीन के साथ सुविचारित संतुलन वाले हमारे रिश्ते में उथल-पुथल आ गई है। हमें चीन से पूरी तरह रिश्ता तोड़कर अंकल सैम की गोद में नहीं जा बैठना चाहिए।
चीन के साथ हमें केवल इसलिए संतुलन बनाकर नहीं चलना चाहिए कि वह हमारा पड़ोसी है और पाकिस्तान के अरमानों को हवा दे सकता है। कोविड19 के बाद की जिस विश्व-व्यवस्था की बात की जा रही है, वह अभी हवा-हवाई ही है और यह मान लेना बड़ी बेवकूफी होगी कि वुहान को लेकर दुनिया के गुस्से या संदेह के कारण चीन हमेशा के लिए अलग-थलग पड़ जाएगा।
यहां तक कि क्वाड जैसे उपायों से भारत-प्रशांत और चीन को लेकर खेल खेल रहे अमेरिकी विशेषज्ञ भी शायद भारत की चीन पर निर्भरता और अमेरिका में चीनी कंपनियों के निवेश से जुड़े विषयों को कम करके आंक रहे हैं। ऐसे में माना जा सकता है कि एलएसी पर चीन की गतिविधियों में अचानक आई तेजी का मकसद भारत पर दबाव बनाना हो कि वह पूरी तरह से अमेरिका के पक्ष में नहीं चला जाए।
वैसे भी, भारत के लिए पहले से ही कम परेशानी नहींः उसे अरब देशों को समझाना है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की गहरी जड़ों के मद्देनजर उन्हें चिंतित होने की जरूरत नहीं, बांग्लादेश को भरोसा दिलाना है कि नागरिकता संबंधी हमारी प्रक्रियाओं पर उसे परेशान होने की आवश्यकता नहीं, यह सुनिश्चित करना है कि चीन को श्रीलंका और जगह न दे और तालिबान के बढ़ते प्रभुत्व के बीच अफगानिस्तान के साथ हमारे रिश्ते पर ग्रहण न लग जाए क्योंकि इसके लिए हमारे पास समय और धैर्य दोनों की बेहद कमी है।

चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था आज भी मानव निर्मित संकट और कोरोना वायरस के रूप में ईश्वरीय कोप की मार झेल रही है, पांच अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का हमारा सपना धुंधलाने लगा है। ऐसी परिस्थितियों में केवल जुबानी ‘आत्मनिर्भरता’ के चक्कर में चीन से आने वाले निवेश (हमारे विशाल व्यापार घाटे को कम करने का एकमात्र विकल्प) को रोक देने से हमारा कुछ भी फायदा नहीं होने जा रहा।
सच्चाई तो यह है कि हमारे लिए चीन के साथ व्यापार या सैनिक युद्ध में जाने का कोई मतलब नहीं और उम्मीद करनी चाहिए कि चीन की भी सोच ऐसी ही हो। चीन के खिलाफ अमेरिका के व्यापार युद्ध में पड़ने का तो और भी कोई मतलब नहीं क्योंकि ऐसा करने से दो की लड़ाई में हम मारे जाएंगे।
यह मान लेना कि चीन या अमेरिका में काम कर रहे उद्योग भारत चले आएंगे, बहुत जल्दबाजी होगी। इसके अलावा हमारे लिए तो अभी यह दिखाना भी बाकी है कि वैश्विक महामारी की मार से हम कितनी जल्दी उबर पाते हैं और इस संदर्भ में अब तक तो हमारे प्रयासों में तालमेल की कमी रही है।

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