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Thursday, April 23, 2020

इस मुसकुराहट पर तो बड़े से बड़े जालिम की तलवार कांप जाती



हो सकता है भीड़ से कोई आदमी निकला हो और बोला हो कि अब मत मारो,,ये सुन कर बुजुर्ग संत ने दया के लिये उन जालिमो की तरफ देख कर मुसकुरा दिये हों कि शायद तरस आजाये,,हंसते हुए ये कह रहे हों कि बेटा मै संत हूं,चोर नही हूं,,मुझे छोड़ दो बेटा,,इतना मार लिये कोई बात नही गलतफहमी मे गलती हो गयी है,,मै तुम सबको माफ कर दूंगा,,ईश्वर से तुम सबके भलाई की दुआ करूंगा,,छोड़ दो बेटा, मै संत हूं,,सूरत जा रहा हूं।



या ऐसा होगा कि दरिंदे मार मार कर थक कर कुछ देर के लिये रुक गये हों,,और संत को लगा होगा कि शायद अब नही मारेंगे,,इस लिये अपने ही कातिलों की तरफ प्रेम से देख कर मुसकुरा दिये होंगे,
मगर पागल दरिंदों मे दया कहां,,तरस कहां,,,उनको तो संत का गिड़गिड़ाना और एनर्जी दे रहा था,,इस मुसकुराते चेहरे पर भी जरा सा प्रेम न आया और फिर,,
लिंचिंग हिंदू” की हो या “मुसलमान”की
स्वामी की हो या पहलू खान की.
दर्दनाक है,शर्मनाक है!
🙏न्याय की गुहार सभी के लिए 🙏🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳⛳ 

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